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Showing posts from 2017

बादशाह - The Khan

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सन 1980, दिल्ली के एक अस्पताल में एक 15 साल का लड़का अपनी माँ के साथ ऑपरेशन थिएटर के बाहर बैठा था| ऑपरेशन थिएटर में डॉक्टर उस लडके के पिताजी का इलाज कर रहे थे| ऑपरेशन थिएटर का दरवाज़ा खुलते ही मरीज की सांसे बंद होने की खबर मिली| वो लड़का अपनी रोती हुई माँ को लेकर अस्पताल के बाहर पहुँचा| वहाँ उनकी कार तो थी, पर ड्राईवर इंतजार में थक कर घर चला गया था| लड़के ने अपनी माँ को कार में बिठाया और खुद ड्राईवर कि सीट पर बैठकर कार चलाने लगा| रस्ते में दोनों ने एक दुसरे से कोई बात नही की, पर जैसे ही कार घर के सामने रुकी तो माँ जैसे एक सदमे से जागी और बोली,”बेटे तू ने कार चलाना कब सीखा?” लड़के ने जवाब दिया,”बस अभी सीखा |” उस लड़के के इसी आत्मविश्वास और साहस ने उसे बॉलीवुड का ‘किंग खान’ बनाया| एक दिन शाहरुख़ के पिताजी उन्हें फिल्म दिखाने ले गए, पर टिकट के लिए पैसे कम पड़ गए तो शाहरुख़ के पिताजी ने मूंगफली खरीदी और शाहरुख़ के साथ सडक के किनारे बैठ गए, और शाहरुख़ से बोले,”ये आती जाती गाड़ियाँ कितनी खूबसूरत हैं......चलो आज इन्ही को देखते हैं|” पर शाहरुख़ की बेमिसाल मेहनत ने पासा पलट दिया, आज लोग लाइन म...

डर तो लगेगा....

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भूतों पर विश्वास करना या नही करना लोगों का अपना मत है, पर भूतों के वजूद को नकारा नही जा सकता क्योंकि कुछ घटनाएँ और जश्मदीदों की बातों को अनदेखा नही किया जा सकता है | दिल्ली से सटे गुडगाँव के एक कॉल सेन्टर में काम करनेवाले कुछ लोगों से भरी एक कैब (कार) देर रात एक सड़क से गुजर रही थी| अचानक ही द्वारिका सेक्टर 9 के सुनसान और वीरान सड़क पर कैब रुक गई, शायद गाड़ी में कुछ खराबी आ गयी थी, पर किसी में भी गाड़ी से नीचे उतर ने की हिम्मत नही थी क्योंकि सब ने यहाँ पर मौजूद  एक औरत के भूत की कहानी सुन रखी थी| जितना सन्नाटा उस सड़क पर था, उससे कई गुना ज्यादा सन्नाटा कार के अन्दर था क्योंकि गाड़ी ठीक  उस पीपल के पेड़ के पास बंद हुई थी, जहाँ कई लोगों ने उस औरत के भूत को देखा था | थोड़ी देर बाद, अपनी सारी हिम्मत जुटाकर कार का ड्राईवर नीचे उतरा और गाड़ी के इंजन कि तरफ बढ़ गया| उसे कार के इंजन की जाँच में किसी भी तरह की गड़बड़ी नही मिली, वो कार में वापस बैठा और गाड़ी स्टार्ट की | गाड़ी तुरन्त चालू हो गई | एक एक कर के ड्राईवर ने पैसेंजर को उनके स्टॉप पर छोड़ा, कार में अब भी एक लड़की मौजूद थी जो आखरी...

मेरे फ़ोन में कोई रहता है...

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कई साल पहले मेरे साथ फ़ोन से सम्बंधित एक वाकया हुआ, जो थोडा अजीब है पर बहुत दिलचस्प है| तक़रीबन 8 साल पुरानी बात है, मेरे फ़ोन पर सिटी बैंक की तरफ से क्रेडिट कार्ड अलर्ट के मेसेज आने लगे  पर मेरा सिटी बैंक से कोई भी लेना देना नही था, मै ना ही उनका क्रडिट कार्ड उपयोग कर रही थी, और ना ही मेरा सिटी बैंक में कोई अकाउंट था | मै जल्दी ही समझ गयी कि शायद बैंक वालों ने गलती से मेरा फ़ोन नंबर डाल दिया है | मैंने सिटी बैंक को कॉल और ईमेल के जरिए मेरे फ़ोन नंबर पर से किसी अजनबी क्रडिट कार्ड के अलर्टस बंद करने की अपील की, पर कुछ नहीं हुआ | मुझे अब भी क्रेडिट कार्ड से हो रही शौपिंग के अलर्ट मेसेज आते रहे, पहले तो मुझे गुस्सा आता था लेकिन कुछ दिनों के बाद ये मेरी जिंदगी का हिस्सा बन गया | मुझे किसी दुसरे की शोपिंग डिटेल्स पढने में मजा आने लगा | उस क्रेडिट कार्ड से बहुत कम शोपिंग होती थी, कभी – कभी बिग बाज़ार से 280 रूपये का मेसेज, तो कभी 300 रूपये की रेलवे टिकट, इस तरह के खर्च होते थे | शायद वो कार्ड किसी आम आदमी का था, जो ना तो थिएटर में जाता था और ना ही किसी होटल या महेंगी जगह पर जाता था...

The Inspirational Life of Kader Khan - Part II

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The previous article highlighted the challenges faced by Kader Khan & his mom. This article is dealing with the professional life of Kader Khan. Tap here to read Part I Kader Khan followed his mom's words and studied hard. After completing post graduation in Civil engineering, he entered in the teaching profession. He was the most loved professor among the students. He mentioned in an interview that he had no wish to be a part of Bollywood. He was happy with his teaching profession. He accidentally became a part of Indian cinema. One day, there was an inter college drama competition. Kader Khan represented his college, he wrote and directed a play, named  'Local Train' . This play won the Best Writer, the Best Director likewise all the awards which were there in the competition. Kadar received the 1st cash price, amounting Rs. 1500/-. The judges of the competition were belonging toIndian Cinema, They persuade Kader Khan to write dialogues for their u...

बोझ

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मैं अपनी हथेली पर बी.ए. की डिग्री का बोझ लिए नौकरी की तलाश में कई दफ्तरों की खाक छान रहा था | मुझे नौकरी की शख्त जरुरत थी, क्योंकि मुझ पर जिम्मेदारियों का बोझ बढ़ गया था | मेरे बाबूजी दूसरों के खेत में मजदूरी करते थे | मैं दोपहर को उन्हें खाना पहूँचाने जाया करता था | मैंने बाबूजी से कहा,"बाबूजी, जब कोई नौकरी नही मिल जाती, तब तक मैं खेती ही कर लूँ,?" बबुजी बोले,"बेटा खेती गंवारो का काम है,थोड़ी इन्तजार करो नौकरी मिल जाएगी |" मुझे एक छोटी-सी नौकरी तो मिल गयी,पर पहली तनखा मिलने से पहले ही बाबूजी की तबीयत काफी बिगड़ गयी | अस्पताल बहुत दूर होने वजह से पैसे तो गाड़ी के किराये में ख़त्म हो जाते थे, दवाईयाँ मेरी हैसियत से बाहर हो गयीं | डाक्टर ने कुछ बवाएं लाने को कहा पर मेरे पास दवा के पुरे पैसे नही थे| मैं अस्पताल से बाहर आकर सामने के बस स्टैंड पर बैठकर अपने आप पर तरस खा रहा था| मैं हताश और बेबस होकर जमीन की ओर देख रहा था तभी किसी ने आवाज दी,"यहाँ क्या बस का इन्तजार कर रहे हो ?" ये आवाज मंजूषा की थी उसने अपनी कार की तरफ इशारा करते हुए कहा," हम गो...